Saturday, June 6, 2015

Dil

दिल चीरा था अपनी मुस्कान से,
 जब नफ़रत  बस्ती थी मेरे इन्तक़ाम में,
एक तराना मुहब्बत का सुनाया था....
और छप गई तस्वीर दिल के मकान में

Monday, June 25, 2012

KALAM

कलम उठती नहीं दिल के लग जाने से

अगर जज़्बात चोटिल हो तो अश्क खुदबखुद स्याही बन जाते हैं 

Tuesday, July 5, 2011

Jab pyaar kiya tha

कभी  दूर  दरिया  के  उस  पार  से  दो  निगाहों  ने  हमारा  दीदार  किया  था ....
मुहब्बत  का  ज़ालिम  गुनाह  हमारे  दिल  ने  भी  प्यार  किया  था ....
वफ़ा  की  घनी  अँधेरी  राहों  पे  हमने  भी  ऐतबार  किया  था ...
उस  पास  के  दूर  दिल  पे  हमारे  दिल  ने  ही  इख्तियार  किया  था ....

KARZ......

कभी  दूर  होते  हैं , तो  न  जाने  क्या  क्या  फ़र्ज़  कर  लेते  हैं ....
जब  पास  होते  हैं  तो  आपको  अपने  दिल  में  दर्ज  कर  लेते  हैं ....
यह  तो  आपकी  ही  मुहब्बत  का  आलम  है  साक़ी ...
जब  भी  तुलना  करते  हैं , खुदको  आपके  लिए  क़र्ज़  कर  लेते  हैं ....

Achha Lagta Hai.....

मैं  तो  न  था  उसका  तलबगार  कभी  भी  ‘Mohsin’.
कशिश  ही  उस  में  कुछ  ऐसी  थी ,  के  ज़िद  बन  गया  वो  मेरी …!

एसी  ज़िद  के  आगे  झुक  जाना  अच्छा  लगता  है ....
उसके  लिए  हर  हद  से  गुज़र  जाना  अच्छा  लगता  है ....

माना  कभी  साथ  में  जी  नहीं  सकते
इसलिए  मर  जाना  अच्छा  लगता  है ....

Aukaat.....

मेरे  खुदा  ने  बहुत नवाज़ा  है  मुझको ,

मेरी  औकात  के  बराबर  मिलता  तो  शायद  “तुम”  न  मिलते ..!!

मैने  बिताया  हर  पल  तन्हाई  में  नदिया  किनारे  पे
काश  मुझे  भी  तोला  होता  मेरे  अश्कों  के  धारों  से

तो  कसम  तुम्हे  अपनी  औकात  बता  देते
इतना  चाहते  थे  की  सैलाब  बहा  देते .....

Thukraana.....


जिनके  रास्ते  का  हर  पत्थर  हम  हटाते  चले  गये 
उनकी  इंसानियत  तो   देखो  वोह  हमे  ठोकर  लगा  कर  चले  गये


एसा  भी  हुआ  मेरे  साथ
मिला  हर  कोई ....पर  चला  न  कोई  साथ

जब  तक  रहे  साथ  तब  तक  सरहाते  गए
हम  गिरे  भी  नहीं  थे
सँभालते  तो  क्या  वो  हमे
बस  ठुकरा  कर  चले  गए 


Saturday, July 2, 2011

Dar Lagta Hai

यूँ तो हमे कभी शायर कहते थे ,
मगर ना जाने आज क्यूँ अपनी पहचान से डर लगता है ,
शौकिया तौर पे हमारे दिल से खेला था
जाने कैसा खेल था कि आज भी ऐतबार से दिल डरता है

Sunday, March 13, 2011

Ilzaam

मुझ पर कभी इलज़ाम आया था
जब भी मोहब्बत का नाम आया था
ठुकराकर मुझे हर कोई बस गया
फरिश्तों का भी ये पैगाम आया था 

सनसनी हुई थी इश्क-ऐ-अंजाम से
गुनाह करे थे दिल-ऐ-नादान ने
क्यों जी रहा था बिन ज़ख्मों को भुलाए
जब खुशियाँ ही थी गम-ऐ-मकान में

Hum Aur Tum

जब रास्ते थे पर मंजिले नहीं
जब जुगनू थे पर अँधेरे नहीं
कमबख्त केसे पल है ये प्यार के 
जब हम थे तुम नहीं और तुम हो तो हम नहीं............


Saturday, February 26, 2011

Dil Kehta hai

जब रास्ते थे पर मंजिले नहीं
जब जुगनू थे पर अँधेरे नहीं
कमबख्त कैसे पल है ये प्यार के
जब तुम थे तो हम नहीं और हम है तो तुम नहीं

मेरी दुआ है रब से तुम्हे हर ख़ुशी नसीब हो
गम दुःख दर्द में तुम सबसे गरीब हो
खुदा बक्षे तम्हे ऐसी ज़िन्दगी 
लबों पे आने से पहले तेरी ख्वाहिश तेरे करीब हो

Friday, February 25, 2011

Sher

क्यों हमे रिश्ते निभाना नही आता
क्यों दिल को दिल भुलाना नही  आता
तड़पना मंज़ूर है  पर
नैनो से झूठे ख्वाब मिटाना नही आता 

काश रिश्तों की गाँठें यूँही खुल जाती
की जो गलतियाँ वो यूँही भुल जाती
बेकैफ़ बयान कर देते दिल के ग़म
 अश्कों से अश्कों की धारा धुल जाती 

Saturday, February 12, 2011

Arz Kiya Hai



छलकती आँखों को वो जाम कहते है

मेरी मोहब्बत को वो इलज़ाम कहते है

बेदर्दी से नीलाम किया मेरा इश्क

किसको बताये इसे क़त्ल-ए-आम कहते है




वक़्त ने कैसे कैसे सितम हम पर ढाए

दिल की उलझनों में ऐसे उलझे

की किसी से छुपा भी न पाए

और किसी को बता भी न पाए




नाम थी आँखें नींद की सिफारिश किस्से करते

बंद की पलकें और झरे आंसु , आंसु की बारिश किसपे करते

Sunday, January 2, 2011

Karishma

भेजा था मौला ने मुझे ये फरमान
मिल जाएगा तेरे दिलबर को हर मुकाम
गर फासला हो जाये हमारे दरमियाँ
मिटा दूँ मैं अपने दिल से उसका नाम


हस्ते हस्ते मैने ये मंज़ूर कीया
चाहत दफ़न करने पर दिल को मजबूर कीया


माँगा खुदा से हर गम खुदके लिए
रहे पूरी कायनाथ की मुस्कराहट उसके लिए


उसे जन्नते अता हुई खुदा से
जब कीमत-ऐ-अश्क बहे मेरी निगाह से


पर मुझसे दूर होना उसे गवारा नहीं था
यकीन था प्यार झूठा हमारा नहीं था
मैं लाख सतालूं उसे पर मुझसे न रूठती थी
बस एक सदा ही उसके दिल से उठती थी
कि हम जीयें, साथ हम मरे साथ
मेरी पलकों में बीते उसकी हर रात

नामंजूर की उसने ऐसी खुशियाँ
जो बढ़ाती थी हमारे बीच दूरियाँ
कहती थी कुछ देर जगमगाते है ऐसे तारे
फिर टूट कर बिखर जाते है सब सितारे
कौनसी ख़ुशी में तुम बिन मज़ा है
तुम्हारे बिन तो सांस लेना भी सज़ा है

देखके मेरे हैबर का प्यार
खुदा ने अपने फैसले से किया इनकार
उसकी हर बात से हुआ सहमत
बरसी हमपर खुदा की रहमत

हुआ दो दिलों का ऐसा मिलन
कहलाते है वो आज भी राधा-किशन

Friday, December 31, 2010

PYAAR

पहली  बार  अकेले  अकेले  जब  तुमको  तन्हा  देखा  था
तन्हाई  तुम्हारी  देख  के  अंजाना  सा  दर्द  होता  था 
वो  तन्हाई  को  मिटाने  के  लिए  जब  मैने  कदम बढ़ाये  थे 
तुम्हे  टूटता  दख  कर  जब  आंसू  मेरे  आए  थे 
बाहों  में  भरके  तुम्हे  जब  अंजाना  सा  एहसास  हुआ 
दिल  मेरा  भी  पिघल  गया , हाए  मुझको  भी  अब  प्यार  हुआ 

जब  तुमसे  मिलने  की  बेचैनी  में  पल  पल  तन्हा  गुज़रता  था 
मनो  जी  तो  रहा  था  मगर  हर  पल  डर  से  मरता  था 
कहीं  तुमसे  बात  न  हुई  तो  जाने  क्या  हो  जाएगा 
धरती  सी  फट  जाएगी  भूचाल  कोई  आ  जाएगा 
मेरी  बेचैनी  मिटाने  तुम  गलियों  तक  आती  थी 
तुम्हे  वहाँ  देख  कर  मेरी  जान  में  जान  आती  थी 
साथ  तुम्हारा  दो  पल  का  मुझे  जन्मो  जन्मो  का  लगता  था 
खुबसूरत  सी  दुनिया में , तुम  में  इक  अपना  दिखता  था 
अदाएं  तुम्हारी  कितनी  दिलकश , दीवाना  सा  कर  जाती  थी 
तुम्हारे  बिन  अब  रातों  को  नींद  कहाँ  आती  थी 

चुप  चुप  के  जब  रातों  को  हम  छत  पे  जाया  करते  थे 
खाली  खाली  आसमान  देख  कर  मन  बहलाया  करते  थे 
याद  आती  दिन  भर  की  बातें  साथ  बिताये  अपने  पल  पल 
सोचते  थे  रुक  जाये , थम  जाये  घड़ियाँ  न  पड़ें  अब  चल 
जब  रात  को  आसमान  में  बादल  आ  जाया  करते  थे 
तुम्हारी  सूरत  वाले  उस  चाँद  को  छुपाया  करते  थे 
बेरंग  सा  हो  जाता  था  ये  समां  हाए  उस  रात  को 
छिप  जाते  थे  टिम  टिम  तारे  जो  कहते  थे  अपनी  बात  को 

मगर  जब  आती  थी  मावस  की  रातें  सिर्फ  अँधेरा  छाया  करता  था 
उस  घने  अँधेरे  में  भी  तू  मुझे  अपनाया  करता  था 
धीरे  धीरे  बीती  वो  रातें  रोज़  दीदार  तुम्हारा  होने  लगा 
उन  रतियों  के  अंधियारों  में   कुछ  सपने  में  संजोने  लगा 
चलती  टिक  टिक  घड़ियों  का  शोर  सुनाई  देता  था 
पलकें  जब  बंद  होती  चेहरा  दिखाई  देता  था 

नींद  न  आती  थी  हमे , बस  नैन  बंद  होते  थे 
प्यारा  इक  चेहरा  दिखे , हम  बस  इसे  ही  सोते  थे 
हसी  तेरी  दख  कर  दीवाने  से  हो  जाते  थे 
खो  जाते  थे  तुझमे, तुझमे  ग़ुम  हो  जाते  थे 


फिर  उस  कड़कती  धूप  में  जब  मिलते  थे  हम  बागों  में 
कलियाँ  तक  खिल  जाती  थी , फूल  भरी  अपनी  राहों  में 
फिर  किसी  जब  पेड़  के  नीचे  कुछ  देर  हम  ठेहरा  करते  थे 
दूर  से  ही  ज़माने  की  नज़रें  तब  हम  पर  पहरा  रखते  थे 
हम  बेफिक्र  एक  दूजे  में  गुम  हो  जाया  करते  थे 
एक  दूजे  की  निगाहों  में  ही  सो  जाया  करते  थे 

उस  सन्नाटे  में  जब  भी  लहरें  उठती  थी  मौजों  की 
करीब  से  दिल  की  बातें  होती  थी  तब  नैनों  की 
रेशमी  उन  जुल्फों  का  जब  साया  आया  करता  था 
चेहरे  पे  लगता  था  पर  दिल  पे  छाया  करता  था 
पूरे  दिन  क  काम  में  जब  काया  चूर  चूर  हो  जाती  थी 
थकन  बस  उस , छाया  की  ठंडक  से  दूर  हो  जाती  थी 


फिर  बिछड़ने  का  पल  निकट  हमारे  आता  था 
आबाद  सी  उस  दुनिया  से  दूर  ले  जाया  जाता  था 
मज़बूरी  के  आगे  मजबूर  होकर  बिखर  जाते  थे 
रोज़  एक  दूजे  को  नए  कसमे - वादे  सुनाते  थे 

हकीकत  से  रूबरू  हुआ , सपना  मेरा  मजबूर  हुआ 
तन्हाई  मेरे  हाथ  लगी , बाकी  सबसे  मैं  दूर  हुआ 

सुनी  खामोश  दिल  ने  सन्नाटे  की  जब  आवाज़  थी 
खुद  को  समझाने  पर  भी  आई  तुम  मन  को  रास  थी 
मगर  कुछ  कहने  को  जब  जब  घबराया  करता  था 
खुद  से  दूर  पाकर  तुमको  जब  तुमको  न  पाया  करता  था
तन्हाई  में  रहने  वालो  की  जब  महफ़िल  में   जाया  करता  था 
जबरन  मेरे  लबों  से  जब  कोई  जाम  लगाया  करता  था 
सोचा  था  हमे  कोई  तो  अब  मनाने  आयेगा 
इस  टूटे  दिलों  की  महफ़िल  में  कोई  तो  हँसाने  आयेगा 

दिल  के  टूट  जाने  पर  भी  जब  आंसू  न  बहा  करते  थे 
पत्थर  उस  सनम  के  बिना  भी  हम  न  रहा  करते  थे 
जग  हस्त  था  देख  के  हमारी  मज़बूरी  को 
बस  मै  ही  जानता  था  अपने  बिच  की  दूरी  को 
जब  दर्पण  मै  भी  तुम्हारा  अक्स  दिखाई  देता  था 
जब  भीड़  भरे  चौराहों  पर  अपना  नाम  सुनाई  देता  था 
हरपाल  तम्हारे  पास  होने  का  सपना  टूट  जाता  था 
जिंदगी  की  राहों  मै  हर  अपना  रूठ  जाता  था 

हरपल  इसी  ख़ामोशी  के  जब  मेले  से  लग  जाते  थे 
हर  किसी  के  साथ  रहकर  भी  अकेले  से  हो  जाते  थे 
हम  को  हरदम  एक  सपना  दिखाई  देता  था 
सपने  मै  मझको  बस  सब  अपना  दिखाई  देता  था 
काश  पूरे  हो  जाते  बंद  आँखों  के  सपने  भी 
काश  सब  मै  से  मिल  जाते  कुछ  चंद  हमराही  अपने  भी
काश  हम  पर  भी  कभी  कोई  मेहरबान  हो  जाता 
काश  हमारे  लिए  कोई  अँखियाँ  अपनी  बरसता 

पर  ऐसे  ख्वाबों  को  आँखों  मै  भी  जगह  मिली  नही 
इन  ख्वाबों  को  दिल  मै  बसा  ले  ऐसी  हमसफ़र  मिली  नही 

पर  वक़्त  ने  हमारे  साथ  ही  मजाक  ऐसा  कर  डाला  था 
जिसे  मैं  अपना  दोस्त  कहता  वही  मुझे  दुश्मन  बताता  था 
उसकी  यादों  को  भूल  जाना  इक  गद्दारी  सा  होता  है 
पर  उनके  संग  अब  जीना  तो  मरने  से  भारी  होता  है 
ऐसे  सपनो  की  नगरी  से  में  हरपल  शर्मिंदा  रहता  हूँ 
मरकर  भी  जीता  हूँ ,  अपने  हाल  में  जिंदा  रहता  हूँ ............

Saturday, November 20, 2010

Nahi Ho Rahi

बहुत कुछ बताना चाहता हूँ  
पर हिम्मत नहीं हो रही 
बहुत अकेला महसूस कर रहा हूँ 
पर किसी की भी ज़रूरत नहीं हो रही 

जी चाहता है खोल दूँ दिल के सब राज़ 
पर जुर्रत नहीं हो रही 
दिल तो बार बार बिखर रहा है 
पर टूटने की आहट नहीं हो रही 

बार बार रोना चाहता है ये दिल 
पर आँखों से बरसात नहीं हो रही 
उसकी बाहों के आग़ोश में सोना था 
पर कमबख्त रात नहीं हो रही 

कभी कभी खुश हो रहा था दिल
 पर बहारों की सौगात नहीं हो रही 
जादू ये कैसा है सामने हूँ तुम्हारे 
पर लबों से बात नहीं हो रही 


सब कुछ तो कह भी नहीं सकता 
और बयां दास्तान - ए - जज़्बात नहीं हो रही   

Thursday, October 14, 2010

Naazuk pari


मेरी  पहली  कविता : नाज़ुक परी 


एक  नाज़ुक  सी  परी  जो  बस्ती  है   मेरे  ख्वाब  में 
जिसके  लिए  डूबा  रहा  मैं  शराब  में 
उसे  ढूँढा  मैंने  हर  गली 
पर  मिली  न  मुझे  वो  कली
दिल  ही  दिल  में  उसे  हम  चाहते  रहे 
और  अपने  सपनो  में  भी  गवाते  रहे 
जाने  कहाँ   की  रानी  थी  वो 
बस  हमारे  लिए  तो  कहानी  थी  वो 
डूबे  रहे  हम  जिसके  शबाब  में 
एक  नाज़ुक  सी  परी जो  बस्ती  है   मेरे  ख्वाब  में 

ज़िन्दगी  से  अपनी  नाराज़  थे  हम 
चाहकर  भी  न   उसके पास  थे  हम 
इस  कदर  वो  अपनी  ज़िन्दगी  में  मदहोश  थी 
हमारी  आशिकी  भी  उतनी  ही  खामोश  थी 
जिसे  बेइंतेहा  चाहा  हमने  हर  घडी 
मिली  न  मुझे  वो  दो  पल  के  लिए  भी 
मैं  था  इतना  हैरान  परेशान 
पीड़ा  इस  दिल  की  करता  किस  से  बयान 
सदा  गुज़रती  थी  शाम  हमारी  मैखाने  में 
हाँ  वोही  है  हम  जो  न  देखते  थे  कभी  पैमाने  में 
और एक दिन आई वो मेरे गरीबखाने में 
मानो ले आई वो साथ बहारों का मौसम ,और चले गए वो पतझड़ के दिन
हम रह न सकते थे कभी जिनके बिन
आज आई है ख़ुशी बेइंतेहा मेरे हिसाब में
एक  नाज़ुक  सी  परी  जो  बस्ती ह  मेरे  ख्वाब  में

Wednesday, September 8, 2010

Kuch To Dekho

To Those Who Never Fall In Love.........

इन  आँखों  में  छुपे  उस  राज़  को  देखो
सुनो  हर  सुर  को  और  साज़  को  देखो
साथ  ज़िन्दगी  का  कुछ  वक़्त  का  ही  सही
कुछ  देर  तो  प्यार  करने  वाले  जांबाज़  को  देखो

दिल  में  उठी  लहरों  में  बह  कर  तो  देखो
साथी  संग  दो  लफ्ज़  कह  कर  तो  देखो
तन्हाई  में  उस  बिन  रह  कर  तो  देखो
प्यार  के  मीठे  गम  को  सह  कर  तो  देखो

प्यार  में  छुपे  इज़हार  को  देखो
प्यार  में  छुपे  इकरार  को  देखो
प्यार  में  छुपी  तकरार  को  देखो
प्यार  में  छुपी  हार  को  देखो

Zindagi

ज़िन्दगी  के  कुछ  अहम  मोड़  के  लिए  कुछ  पंक्तियाँ

यादों  में  बह  जाने  का  नाम  है  ज़िन्दगी
खामोश  लबों  से  दिल  की  बात  कह  जाने  का  नाम  है  ज़िन्दगी
जुदाई  बेवफा  की  मार  न  दे  आशिक  को
हर  दर्द  को  सह  जाने  का  नाम  है  ज़िन्दगी

इश्क  की  राहों  में  फना  हो  जाना  है  ज़िन्दगी
किसी  के  प्यार  में  सूली  चढ़  जाना  है  ज़िन्दगी
कोई  अपने  टूटे  हुए  दिल  को  कैसे  समझाए
हर  पल  उसी  के  लिए  मर  जाना  है  ज़िन्दगी

टूटे  ख़्वाबों  की  कश्ती  है  ज़िन्दगी
तेरे  मदहोश  नैनो  की  मस्ती  है  ज़िन्दगी
ज़माने  वाले  माने  या  न  माने
अब  बेवफा  पर  न  जचती  है  ज़िन्दगी

सूरज  की  आग  से  बेहोश  है  ज़िन्दगी
चांदनी  इस  रात  में  मदहोश  है  ज़िन्दगी
अब  तो  तुझ  बिन  बीते  हुए  हर  पल  में
तुझी  को  पाने  का  जोश  है  ज़िन्दगी